Monday, March 5, 2018

गलती शास्त्रों में नहीं

यह चुटकुला अर्थात जोक फिर एक बार व्हॉट्सॅप पर आया:

धरम पिता - असली पिता नहीं
धरम माता - असली माता नहीं
धरम पुत्र  - असली पुत्र नहीं
धरम भाई - असली भाई नहीं
धरम बहन - असली बहन नहीं
लेकिन ऐसी जबरदस्त गलती हुई कैसे?
धरम पत्नी मतलब असली पत्नी.
पता करो शास्त्रों में कहां गलती हुई!!!

😜😝😂😂😷😷

गलती शास्त्रों में नहीं, इस जोक को लिखने वाले के दिमाग में हुई है. जरा तर्क लगाएंगे तो इसमें क्या गलती है ये आप को जल्द समझ आ जाएगा.

माता, पिता, पुत्र, बहन, भाई ये सब खून के रिश्ते होते है. इसी लिये आप जब किसी परिचित को इनमें से किसी रिश्ते की तरह मानने लगते हैं तो उसे धर्म का रिश्ता कहा जाता है, क्योंकी आपने उस इन्सान के साथ उस रिश्ते का धर्म की तरह निष्ठा से पालन करना एवं निभाना चाहते हैं.

धर्म की परिभाषा देते हुए भीष्म पितामह महाभारत में कहते हैं— धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः। यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः।। अर्थात्—'जो धारण करता है, एकत्र करता है, उसे ''धर्म'' कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को धारण कर एकसूत्र में बाँध देने की सामर्थ्य है, वह निश्चय ही धर्म है।'
कोई स्त्री आपकी पत्नी बनके जन्म नहीं लेती, आप इस नाते को धारण करते हैं. सामान्यतः आपकी पत्नी से आपका कोई खून का रिश्ता नहीं होता. इसी कारणवश जिस स्त्री से आपकी शादी होती है उसे धर्मपत्नी इसीलिये कहा जाता है की आप ने कोई खून का रिश्ता न होते जन्म का बंधन स्वीकार करते हुए उसका शारीरिक एवं मानसिक तौर पर निष्ठा के साथ जीवनभर साथ देने का निर्णय लिया होता है. अर्थात, आपके जिस स्त्री को पत्नी का दर्जा दिया है उसका इस प्रकार साथ देना आपका दायित्व होता है, अर्थात धर्म होता है. जैसे की आपने किसी को अपना पिता या बहन मानकर उस रिश्ते को निभाने का वचन दिया हुआ होता है.

इसी लिये कहा था, गलती शास्त्रों में नहीं, इस जोक को लिखने वाले के दिमाग में हुई है.

हर बात पर राम, सीता, शास्त्र, वेद, पुराण इनपर चुटकुले सुनाना बंद किजीये और ऐसे चुटकुले आयें तो उनको आगे ढकेलना भी.


© मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन कृ. ४, शके १९३९

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्

प्रातःकाल में दिनदर्शिका अर्थात कैलेंडर की ओर ध्यान गया और देखा रामनवमी अर्थात भगवान श्री राम का जन्मदिन निकट आ रहा है. इस से कुछ महीनों पहले घटी एक घटना का स्मरण हुआ.

रात्रि के भोजन के कुछ समय पश्चात पलंग पर लेटे लेटे बेटा कहने लगा की पिताजी मै नहीं सोऊंगा, नींद नहीं आ रही है. वो आप कभी कभी गाना सुन रहे थे वो फिरसे लगाईये, थोडी देर सुनूंगा. बहुत अच्छा है, ऐसा गाना तो कोई गा नही सकता." छोटा है, मेरे समझ के अनुसार वह कहना चाह रहा था कि बहुत अनुठा गाना है.

वैसे वो कोई गाना नहीं था, तुलसीदासजी लिखित रामस्तुती "श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्" थी. मै जो सुन रहा था उसे गायकों ने थोडा तेज गति से गाया था. केवल २ मिनट की होगी. मैने जैसे ही वो लगाई, समाप्त होने से पहले ही मुख पर समाधान के भाव लिये बेटेजी एकदम शांती से सो गये थे.

बहुत अचरज हुआ, इस कारण कि अगर वो सोना नहीं चाहता तो नहीं सोता, चाहे कितनी भी नींद आ रही हो.

कुछ दिनों मे बेटेजी को इसका मराठी में अर्थ बता दिया. रामस्तुती का अर्थ जानकर बेटेजी को भी बडा आनंद आया.

मेरा मानना है हम बच्चों को ऐसी हमारे भगवान, उनके अवतार, तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं संस्कृती से जुडी कहानियां, स्तोत्र, या गाने सुनाते रहना चाहीए क्योंकि इस प्रकार के ऑडियो/विज्युअल संस्कार आज के समय में बच्चों मे मन पर गहरा असर करते हैं. फिर न कोई वामी इन पर असर कर पायेगा न अधर्मी.

का कही?!

© मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन कृ. ४, शके १९३९