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Friday, July 16, 2021

असंभव को संभव करेंगे स्वामी, बिगडने नहीं दिया यह वामी!

कॉम्रेड प्रकाश रेड्डी ने कुछ समय पहले पोस्ट किया है कि कॉम्रेड बाबूराव शेलार का नाम वो जिस चाल में रहते हैं वहीं पास के किसी रास्ते को दिया गया है । उस समय उनके घर पर एक छोटा सा रिसेप्शन रहा होगा यह फोटो तब कें हैं।

 

अब सोशल डिस्टेंसिंग, कई लोगों के चेहरे पर मास्क न होना आदि छोटी-छोटी बातों को छोडिये। मजेदार बात अलग है। 

प्रतिमा और पूजा रॉय इन दो बहनों को नासा में इंटर्नशिप के लिए चुना गया था। नासा ने उनकी फोटो सांझा करने की देर थी कि लड़कियां इतनी पढ़ी-लिखी होने के बाद भी अपने माथे पर क्या टिकी लगाती हैं और देवीदेवताओ की मूर्तियाँ या चित्र क्यूं रखती हैं आदि लिखकर उन्हें भारी मात्रा में ट्रोल किया गया।


परंतु वो भगवान पर विश्वास करती हैं तो ऐसा करना स्वाभाविक है। परंतु आदीवामपंथी मार्क्सबाबा कहकर गये हैं कि Religion is the opium of the masses (रिलिजियन अफीम की गोली है), तो आपके दो कॉम्रेडों में से एक के माथे पर तिलक एवं दूसरे के घर में देवी-देवताओं के चित्र कैसे दिखाई देते है? ये तो कुछ भी नहीं! महाराष्ट्र में एक स्वामीजी थे स्वामी समर्थ; तो जिस लकडी के फलक  पर देवीदेवताओं के चित्र रखे हैं उसके बायीं ओर "असंभव को संभव करेंगे स्वामी" एवं नीचे "डरो मत, हम तुम्हारे साथ है" ये उनके भक्तीपर वचन लिखे गये हैं!! अपने मूल भूलना सहज नहीं होता।   इसे निधर्मी वामपंथ की हार एवं आस्तिकता का विजय ही मानना पडेगा। 

तो लिब्रंडूओं और वामीयों, आप उन्हें विचारधारा के प्रति निष्ठावान न होने के कारण कुछ सीख नहीं देंगे? क्या आप उन्हें कुछ नहीं कहेंगे? देखिए, नीचे कॉम्रेड प्रकाश रेड्डी के पोस्ट की लिंक है। खुला प्रस्ताव, आप को कॉम्रेड को सुधारना ही होगा! कॉम्रेड प्रकाश रेड्डी के पोस्ट की लिंक यह रही — https://www.facebook.com/prakash.reddy/posts/10225535914535407 

जाते जाते: कल एक फोटो देखी थी जिसमें साम्यवादी व्यवसायिक क्रांतीकारक चे ग्वेरा की एक बड़ी तस्वीर कूड़ेदान में फेंकी दिखाई देती है, वैसे ही बाबूराव के परिवारने जिस प्रकार घर में पूजापाठ कर के उनकी विचारधारा का कचरा कर दिया है उसी प्रकार उनके घर का कूड़ेदान यदि दिखाई दिया तो उसमें किस किस के फोटो मिलने की संभावना है ये सोचकर और हसीं आ रही है।

© मंदार दिलीप जोशी
आषाढ शु. ७, विवस्वत सप्तमी


Wednesday, March 17, 2021

प्रेश्यावृत्ती मिडिया एवं वामपंथी दोगलापन


 

इस विडियों में कुछ त्रासदीयां एवं विरोधाभास समाये हुये हैं. त्रासदी यह है कि दशकों के वामपंथी शासन के बाद पश्चिम बंगाल राज्य की ये अवस्था है कि आज भी यहां मनुष्यों को रिक्षा खिंचनी पडती है. वामपंथ गरीब को गरीब बनाये रखता है, जिसके कारण जो रिक्षावाला कल खुद रिक्षा खिंचता था वो आज भी यही कर रहा है. पर्यटन के लिये आकर्षण का विषय होना एक बात है, परंतु उद्योगों के नष्ट होने के कारण एवं पीढी दर पीढी पेट पालने के लिये किसीको यह करना पड रहा है तो इसका दोष साम्यवादी व्यवस्था को ही जाता है. गरीब को गरीब ही बनाये रखना – वामपंथ की यही तो खासीयत है!

विरोधाभास यह है कि सदैव पक्षी तथा प्राणीप्रेम से ग्रस्त मिडिया की निद्रा केवल हिंदू उत्सवों के समय खुलती है, जैसे संक्रांत एवं दिवाली को. वामपंथी मिडिया को पतंग के डोर के कारण पक्षीयों को एवं पटाखों के कारण अनुष्का शर्मा के कुत्ते को होने वाली तकलीफ बहुत बडी दिखती है, परंतु प्रत्यक्ष कोई मानव आज भी रिक्षा स्वयं खींचने को विवश है, इसपर मिडिया ध्यान तो देती नहीं परंतु वो इसके मजे भी लूटते हैं. आप देख सकते है, सीएनएन न्युज १८ की पल्लवी घोष किस निर्लज्जता से मानवी रिक्षा के मजे लेते हुए यह बात कर रही हैं कि किस प्रकार पश्चिम बंगाल में चुनाव के मुद्दे हैं जय श्रीराम बनाम जय सियाराम, रविंद्रनाथ ठाकुर तथा सुभाषचंद्र बोस! 

चलो कम से कम यह मनुष्य मेहनत की कमा रहा है, परंतु क्या सीएनएन न्युज १८ पल्ल्वी घोष को यह असाइनमेंट नही दे सकते थे की उस रिक्षावाले का ही साक्षात्कार लें, उसकी व्यथाओं को जाने, यात्रिओं से लदी रिक्षा खींचने चकर लोगों के आवागमन मे सहय्यता करने की उसकी विवशता को सबके सामने लायें? क्या ऐसा इंटरव्यु लेकर जनता को यह ज्ञात क्यूं नहीं कराया गया कि किस प्रकार जैसे होस्ट के मरने पर परजीवी वायरस या जंतु दुसरे होस्ट को अपन घर बना लेता है, उसी प्रकार कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने....क्षमाप्रार्थी हूं....कम्युनिस्ट पार्टी के गुंडोंने पार्टी का राज समाप्त होने पर तृणमूल काँग्रेस मे स्थलांतर कर दिया था, वैसे ही कम्युनिस्ट पार्टी के नीतियों ने भी तृणमूल काँग्रेस के राज में भी अपना प्रभाव कायम रखते हुये गरीब को गरीब रखने की परंपरा कायम रखी है? 

परंतु वे ऐसा तभी करेंगे, वे इस रिक्षावाले की गरीबी एवं विवशता को तभी हाईलाईट करेंगे, जब कोई निजी बस चलाने की बात करेगा की देखीये निजीकरण के कारण कैसे इस गरीब की, जिसे गाडी चलाना नहीं आता, रोटी छीनी जा रही है, उसे गरीबी में जीने पर मजबूर किया जा रहा है. यदि पश्चिम बंगाल राज्य में चुनाव के माध्यम से वास्तविक क्रांती हो जाये और भाजप सत्ता में आ जाये, तो यही मिडिया इस रिक्षावाले को लेकर स्टोरी चलायेगा कि देखो कैसे सबका विकास करने की बात करनेवाले मोदी सरकार के राज में आज भी एक रिक्षावाले को स्वयं यात्रियों को ढोना पड रहा है. दुसरे किसी चॅनल पर ऐसा नॅरेटिव्ह चलाया जाने की पूरी संभावना है कि निजीकरण के कारण कैसे गरीब रिक्षावाले को गरीब रहना पड रहा है और यही बात उठाते हुए राहुल गांधी अदानी-अंबानी को कोसेंगे. यदि बसें सरकारी हों, तो यह भी हो सकता है कि मिडीया यह बात चलाये कि देखो बसे चली तो इंडिया और भारत के बीच की खाई और गहरी हो गयी. कैसे कैसे नॅरेटिव्ह चलेंगे इसकी संभावनाएं तो असंख्य हैं. 

तो वामपंथ एवं वामपंथ से ग्रस्त मिडिया की यही विशेषता है कि जो बोलो उसे स्वयं करो नहीं,  जो ना करने के लिये बोलो उसे घोष मॅडम की तरह निर्लज्जता से करो उपर से लोगों को वही बात करने पर अपराधगंड से ग्रस्त रखो. यही वामपंथ की पहचान है. 

अन्य राज्यों में, जहां पर वामपंथी सरकारें नहीं हैं, वहां पर मानवी रिक्षाओं के स्थान पर सायकिल रिक्षायें लायीं गयीं, और आज कई स्थानों पर सायकिल रिक्षाओं के स्थान पर मोटराइज्ड रिक्षायें चलती हैं. काम करने के लिये मानवी श्रम को कम करने का यशस्वी प्रयास वामपंथ कभी नहीं करता. 'नया दौर' लाना है तो टांगे के लिये शॉर्टकट सडक बनाने पर लोगों को अपना समय एवं श्रम बरबाद करने पर मजबूर करना विवेक नहीं है, अपितु मानवी श्रम कम करने की तकनीक आती है तो हुनर सीखकर आगे बढनें में ही भलाई है. 'नया दौर' साम्यवाद से नहीं आता, वो आता है व्यापार की स्वतंत्रता से जिसे बडे प्यार से वामपंथीयों ने पूंजीवाद का लेबल लगाया है.  

CNNNews18 Correspondent Pallavi Ghosh

© मंदार दिलीप जोशी

Monday, June 29, 2020

मराठी चुड़ैलों की फिल्मोंं में कमी

आप को कदाचित पता होगा कि अनुष्का शर्मा की संस्कारी चुड़ैलों की ट्रायलॉजी में तीसरी फिल्म है, बुलबुल. फिल्लौरी, परी और अब बुलबुल. एक पंजाबी, एक बांग्लादेशी और एक बंगाली चुड़ैल.

मुझे एक बात की शिकायत है अनुष्का शर्मा से. वैसे उनके पती विराट से भी है की वो मराठीयों को टीम में ज्यादा लेते नहीं हैं। यही शिकायत अनुष्का से भी है।

ब्रूस विलीस की डाय हार्ड अर्थात कडक मृत्यू फिल्मो के तीन भाग होते होते लगा था चरम पर सिरीज खतम हो गयी है। परंतु नहीं। गन्ने के भूत से भी रस निकालने की कला तो हमें अवगत है परंतु उस कला का फिल्मो में यशस्वी प्रयोग हॉलिवूड ने ही किया है। ऊन्होने ऑफिसर मक्लेन के किरदार को रबरबँड से अधिक खिंचते हुए चौथे भाग में बेटी एवं पांचवे भाग में बेटे का किरदार को लेकर दो और फिल्में बना डालीं। 

उसी प्रकार संस्कारी चुड़ैलों के सिरीज में चौथी फिल्म में चुड़ैल को मराठी दिखा सकते हैं।  वैसे मेरे मस्तिष्क में इस रोल के लिये तीन महिलाओं का नाम है परंतु वो अपने समाजसेवा एवं राजनीती के अच्छी खासी आमदनी के क्षेत्रों को छोडकर फ़िल्मों में आने के लिये तैय्यार होंगी भी या नहीं पता नहीं। खैर कुछ ना कुछ जुगाड़ हो जायेगा।

वैसे अजिंक्य रहाणे से पता चला है की विराट को मराठीयों से विराट को वैसे तो कोई समस्या नहीं हैं परंतु उनका कहना है की मराठीयों की गालियाँ उतनी पॉवरफुल नहीं लगतीं जितना पंजाबीयों की जाकर दुष्मन को चुभती हैं। मैं फेसबुक के माध्यम से उनको बताना चाहता हूं कि ऐसा कतई नहीं है। 

मुझे लगता है कि ऐसी ही कोई शिकायत अनुष्का शर्मा को होगी। उन्हें लगता होगा कितना भी मेकअप कर लो मराठी अभिनेत्रीयां उतनी डरावनी नहीं लगेंगी। तो मैं उन्हें आश्वस्त कर देना चाहता हूं कि मैने उपर जिन तीन महिलाओं की बात की है उन्हे देखकर स्वर्गीय रफी साहब के 'उन्हे देखकर रो रहे हैं सभी' गाने की याद आ जायेगी। और तो और मेकप की भी आवश्यकता नहीं पडेगी। 

परंतु उनका नाम अभी नहीं बता सकता। कमिशन का प्रश्न है। और सायनिंग अमाउंट पसंद नहीं आया तो मुझे बंगले पर ले जाकर....खैर....आप पहले अनुष्का से चौथे सिक्वेल के एमओयु अर्थात मेमोरँडम ऑफ अंडरस्टँडिंग पर साइन तो करवाईए।

🖋️ मंदार दिलीप जोशी
आषाढ शु. ९, शके १९४२

Friday, April 17, 2020

एकस्रोत अधर्मी एवं रामायण

रामायण के परसोंं के एपिसोड में महाराज बिभीषण वैद्यराज सुषेण से कहते हैं:
धर्म और अधर्म की व्याख्या सदैव एक नहीं रहती। वैद्य का धर्म है, सबकी पीडा हरना एवं उनके प्राणो की रक्षा करना। वैद्यक किसीं एक के लिये नहीं, अपितु सारे मानवजाती की दुखदर्द की रक्षा का उपाय करने एवं उसकी पीडा हरने के लिये है। यही चिकित्सक का सर्वोपरी धर्म है।

वैद्यराज सुषेण कहते हैं: राजनीती का सिद्धान्त कहता हैं कि आपको मेरा विश्वास नहीं करना चाहीये। मैं शत्रूपक्ष का वैद्य हूं। आप के रोगी का अहित कर सकता हूं।

इसपर प्रभू श्रीराम कहते हैं:
वैद्य का कोई शत्रू नहीं होता, कोई मित्र नहीं होता। वैद्य और रोगी के बीच तो केवल विश्वास की एक अलौकिक डोर होती है। मैं अपने अनुज लक्ष्मण को आप को सुपूर्द करता हूं। राजभक्ती का पालन करने के लिये चाहे तो इसके प्राण ले लिजीये अथवा वैद्य का धर्म पालन करने के लिये इसे जीवनदान दे दिजीये, ये मैं आप पर छोडता हूं। आप पर मुझे पूरा विश्वास है।

प्रभू श्रीराम तो अपने शत्रू के वैद्यराज के हाथ अपने अनुज के प्राण रख देते हैं। तथा रावण जैसे असुर के राजवैद्य सुषेण भी लक्ष्मण की सुश्रुषा करने के लिये तैय्यार हो जाते हैं।


हमारे वैद्यराज एवं समस्त आरोग्य सेवकों ने इसी प्रकार अपने पराये का भेद किये बिना, समस्त रोगीयों की पीडा का उपाय एवं उनके जीवित की रक्षा कर रहे हैं। यह रोग तो ऐसा है कि रोगी पर उपचार करने वाले वैद्यक समुदाय को ही यह रोग होने की पूर्ण संभावना होती है। फिर भी हमारे समस्त वैद्यराज तथा आरोग्यसेवक यह सोचे बिना सारे रोगीयों की सेवा कर रहे हैं कि इनमें से कुछ रोगीयों में ऐसे असुरी मानसिकता के लोग हैं जिनके विचार कई शतकों से मानवता का विनाश ही करते आ रहे हैं, एवं भविष्य में भी करते रहेंगे ।

परंतु इसके उपलक्ष में उनपर कुछ एकस्रोत अधर्मी (sℹ️ngle s⭕️urce threat) पत्त्थर फेंकने का, वमन तथा थूत्कृत्य करने का, विवस्त्र होकर नग्नावस्था में नृत्य करने का दुःसाहस कर रहे हैं। इन्हें न मानवता की चिंता है न महिलाओं के सन्मान की। आज न तो ऐसे धर्मपालन करने वाले प्रभू राम हैं न तो ऐसे रोगी जिनके लिये वैद्यराज तथा आरोग्यसेवक अपने प्राण दांव पर लगा दें और न तो ऐसे धर्मपालक रोगी एवं उनके परिजन हैं जो शत्रू के हाथ अपने रोगी के प्राण विश्वासपूर्वक सुपूर्द कर दें।
इस अवस्था में हमारे वैद्र्यराज तथा आरोग्यसेवकों को स्मरण रहे, कि वैद्यों पर जो रोगी की रक्षा का दायित्व है, वो केवल उस समय तक है जब तक रोगी अपने धर्म का पालन करे। रोगी यदि अपनी व्याधी के कारण उत्पन्न भ्रम के चलते कोई असभ्य कृत्य करता है तो वह रोग का ही एक भाग होता है, तस्मात इस अवस्था में भी वैद्य अपने सुश्रुषा के धर्म का पलन करने के प्रति बाध्य होते ही हैं।

परंतु यदि सामनेवाला केवल अपने धर्म का पालन नहीं करता अपितु वो एक महापापी विचार से षडयंत्र का भाग बनकर वैद्य समुदाय पर उनके दुष्कृत्यों से अत्याचार करता है, तो पुलिस, न्यायालय, एवं सरकार का यह कर्तव्य है कि वे वैद्यक समुदाय को मार्गदर्शन करें कि ऐसे अधर्मीयों से कैसे वर्तन करें तथा उन्हें ऐसे वर्तन के लिये यह अधिकार भी प्रदान करें जिससे उन्हें आगे चलकर समस्या न उत्पन्न हो।

प्रभू श्रीराम ने यह भी कहा था कि हमारी शरण में आनेवाले के प्राणरक्षण करना हमारा धर्म है। परंतु यदि कोई युद्ध की इच्छा से हमारे समक्ष उपस्थित होता है तो उससे युद्ध करना ही हमारा धर्म तथा कर्तव्य है। तो यह एकस्त्रोत अधर्मी हमारे वैद्यक समूदाय से जिस प्रकार का वर्तन कर रहे हैं, वह युद्ध ही तो है। इस कारण वैद्यक समुदाय को ऐसे मार्गदर्शन की नितांत आवश्यकता है।

प्रभू श्रीराम सबकी रक्षा करे। जय श्रीराम 🙏

© मंदार दिलीप जोशी

Monday, February 24, 2020

कबीर कला मंच - शहरी व सशस्त्र नक्षलवाद संबंध

~ हिंदी ~

यह पोस्ट इम्तियाज जलील के बयान पर ध्यान आकर्षित करने के लिए नहीं है। हालांकि इन लोगों से कोई पृथक अपेक्षा नहीं है, अंतिम वाक्य पर ध्यान देना आवश्यक है। किसी को भी पता न चलने दें, बस लोगों को उत्तेजित और परेशान करें।

इस पोस्टका मुख्य विषय लाल कोष्ठकमें रेखांकित किया गया है ही| जो कबीर कला मंच शहरी और सशस्त्र नस्लवाद का सक्रिय समर्थक रहा है, उसके कार्यकर्त्याओं की उपस्थिती सीएए के विरोध में हो रहे शांतीदूतों के कार्यक्रमं में होना आश्चर्यकारक है ही नहीं| यह कहना पर्याप्त है कि मंच के कार्यकर्ता एल्रगार सम्मेलन और कई अन्य ऐसी घटनाओं में सक्रिय रूप से कार्यरत होने के इंटेलिजन्स रिपोर्ट हैं। इस तरह से भारत का हर टुकडे टुकडे गँग एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।

कबीर कला मंच के विषय में समय समय पर जानकारी देता रहूंगा, यद्यपि बहुत सारा मटेरिअल मराठी में है.

अपने आसपास ऐसे लोगों पर नजर रखें, हो सके तो फोटो भी निकालें, अपनी सुरक्षा का ध्यान रखकर| आगे जब भी महाराष्ट्र में चुनाव होंगे, तब इस बात का स्मरण रहे इतना पर्याप्त है. महाराष्ट्र में आपके परिजन रहते हैं तो उनको अवश्य ये पोस्ट दिखायें|

यदि हो सके तो अपनी वॉलपर यह पोस्ट कॉपी पेस्ट करें, फोटो के साथ|

~ मराठी ~
इम्तियाज जलीलच्या वक्तव्याकडे लक्ष वेधण्यासाठी ही पोस्ट नाही. या लोकांकडून वेगळी अपेक्षा नाहीच, तरी शेवटच्या वाक्याकडे दुर्लक्ष करता येत नाही. कुणाला माहीती देऊ नका, फक्त आंदोलन करायचं आणि लोकांना त्रास द्यायचा.

पोस्टचा मुख्य विषय चित्रात लाल कंसात अधोरेखित केलेलाच आहे. कबीर कला मंच या शहरी व सशस्त्र नक्षलवादाला सक्रीय पाठींबा देणार्‍या तथाकथित संस्कृतिक मंचाच्या कार्यकर्त्यांनी सीएएच्या निमिताने अराजक माजवणार्‍या म्लेंच्छांच्या कार्यक्रमात लावलेली उपस्थिती आश्चर्यकारक अजिबात नाहीच. उलट हे नसते तरच आश्चर्य वाटलं असतं. एल्गार परिषदेत आणि नंतरच्या अनेक गोष्टीत या मंचाच्या कार्यकर्त्यांचा सक्रीय सहभाग असल्याचे गुप्तहेर खात्याचे अहवाल आहेत एवढं सांगितलं तरी पुरेसं असावं. भारत तेरे टुकडे होंगे गँग कशी एकत्र झालेली आहे हेच या निमित्ताने पुन्हा अधोरेखित होतं.

कबीर कला मंचाच्या बाबतीत वेळोवेळी पोस्ट करत राहीनच.

पण पुढे जेव्हा केव्हा महाराष्ट्रात निवडणुका होतील, तेव्हा हे लक्षात ठेवा म्हणजे झालं. जमलं तर अशा लोकांवर लक्ष ठेवा, फोटोही काढा, पण स्वतःची सुरक्षितता ध्यानात ठेवूनच.




इतर काही जुन्या बातम्या:










🖋️ मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन शु. १, शके १९४१

Saturday, July 7, 2018

छाप तिलक सब

कुछ बातें ऐसी हो जाती है, जिससे पता चलता है कि हिन्दू अपने धर्म से आसानी से च्युत नहीं होते!

आज ऑफिस जाते हुए एक बड़ी प्यारी घटना हुई। 

पहले इस की कुछ पृष्ठभूमि बता दूँ - मैंने ट्विटर और फेसबुक पर पढ़ा था कि बगैर भूले माथे पर तिलक धारण कर के ही घर से निकलें, यह अपने धर्म के चिन्ह को गर्व के साथ दिखाने वाली बात है।  कई वर्षों से मेरा यह नित्यक्रम रहा है, सो आज भी तिलक लगा कर पूजा कर मैं घर से निकला। 

रस्ते में मेरी कार ने पैट्रोल माँगा, और धमकाया कि यदि न मिला, तो लौटते समय परेशानी करवाऊँगी! मजबूरन मैं पैट्रोल पम्प की ओर मुडा। पैट्रोल डलवा कर हवा भरवाने रुका था, कि अटेंडेंट ने कौतूहलवश पूछा, "जी, क्या आप पुणे से हैं?" मैंने हामी भरी, और उसके कुतूहल का कारण पूछा। उसने मेरा तिलक देखा था, और शायद उसके पूछने कर अर्थ यह था कि और शहरों के, ख़ास कर मुंबई के लोग अपने धार्मिक चिन्हों का इतना दिखावा नहीं करते है। 

उसके बाद उस की नजर मेरी कार पर लगे हनुमान २.० वाले स्टिकर पर पड़ी, और पूछने लगा कि क्या यह कार्टून है या कोई साधारण चित्र! मैंने उसे बताया कि केरल के किसी कलाकार ने इसे बनाया था, और आंतरजाल के माध्यम से यह विश्वभर फैल गया है, और आज कोई भी इसे बाजार से खरीद सकता है। 

आंतरजाल से शायद वह उतना परिचित न हो, यह जानकर मैंने मेरे पास के स्टिकर्स से एक हनुमान २.० का अंडाकार स्टिकर निकाल कर भेंट किया। उसे पा कर उसकी बाँछे खिल उठी!

इसी बीच गाडी में रखे रामचरितमानस को देखकर उसने पूछा क्या आप रोज पढ़ते हो? मैने कहा एखाद पन्ना रोज पढ़ लेता हूं.

मेरे कार के एक पहिए के वाल्व की टोपी गिर गई थी, सो उस ने खुद से नई लगा कर दी, और जब अगली बार खरीदने जाएं तो कौन सा ब्रैंड बेहतर होगा उस के बारे में भी बताया।  हम ने फिर एक दुसरे की विदा ली, और मैं अपनी राह चलता बना।

मेरे १० वर्ष के वाहन चालन के इतिहास में किसी पैट्रोल पम्प अटेंडेंट से यह मेरी पहली इतनी लम्बी बातचीत थी।  और वह भी मुस्कुराते हुए, बंधुत्व की भावना से! सिर्फ मेरे माथे के तिलक और कार पर सजे हनुमान २.० वाले स्टिकर की वजह से!

सोचा, यहां से अवश्य उभर सकते हैं हम.

दिन के इस से बेहतर प्रारम्भ की मैं कल्पना नहीं कर सकता हूँ!

जय श्रीराम! जय हनुमान!!

मूल लेखन ©️ मंदार दिलीप जोशी
हिंदी रुपांतर: ©️ कृष्ण धारासूरकर

जेष्ठ कृ. ८, शके १९४०

Monday, March 5, 2018

गलती शास्त्रों में नहीं

यह चुटकुला अर्थात जोक फिर एक बार व्हॉट्सॅप पर आया:

धरम पिता - असली पिता नहीं
धरम माता - असली माता नहीं
धरम पुत्र  - असली पुत्र नहीं
धरम भाई - असली भाई नहीं
धरम बहन - असली बहन नहीं
लेकिन ऐसी जबरदस्त गलती हुई कैसे?
धरम पत्नी मतलब असली पत्नी.
पता करो शास्त्रों में कहां गलती हुई!!!

😜😝😂😂😷😷

गलती शास्त्रों में नहीं, इस जोक को लिखने वाले के दिमाग में हुई है. जरा तर्क लगाएंगे तो इसमें क्या गलती है ये आप को जल्द समझ आ जाएगा.

माता, पिता, पुत्र, बहन, भाई ये सब खून के रिश्ते होते है. इसी लिये आप जब किसी परिचित को इनमें से किसी रिश्ते की तरह मानने लगते हैं तो उसे धर्म का रिश्ता कहा जाता है, क्योंकी आपने उस इन्सान के साथ उस रिश्ते का धर्म की तरह निष्ठा से पालन करना एवं निभाना चाहते हैं.

धर्म की परिभाषा देते हुए भीष्म पितामह महाभारत में कहते हैं— धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः। यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः।। अर्थात्—'जो धारण करता है, एकत्र करता है, उसे ''धर्म'' कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को धारण कर एकसूत्र में बाँध देने की सामर्थ्य है, वह निश्चय ही धर्म है।'
कोई स्त्री आपकी पत्नी बनके जन्म नहीं लेती, आप इस नाते को धारण करते हैं. सामान्यतः आपकी पत्नी से आपका कोई खून का रिश्ता नहीं होता. इसी कारणवश जिस स्त्री से आपकी शादी होती है उसे धर्मपत्नी इसीलिये कहा जाता है की आप ने कोई खून का रिश्ता न होते जन्म का बंधन स्वीकार करते हुए उसका शारीरिक एवं मानसिक तौर पर निष्ठा के साथ जीवनभर साथ देने का निर्णय लिया होता है. अर्थात, आपके जिस स्त्री को पत्नी का दर्जा दिया है उसका इस प्रकार साथ देना आपका दायित्व होता है, अर्थात धर्म होता है. जैसे की आपने किसी को अपना पिता या बहन मानकर उस रिश्ते को निभाने का वचन दिया हुआ होता है.

इसी लिये कहा था, गलती शास्त्रों में नहीं, इस जोक को लिखने वाले के दिमाग में हुई है.

हर बात पर राम, सीता, शास्त्र, वेद, पुराण इनपर चुटकुले सुनाना बंद किजीये और ऐसे चुटकुले आयें तो उनको आगे ढकेलना भी.


© मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन कृ. ४, शके १९३९

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्

प्रातःकाल में दिनदर्शिका अर्थात कैलेंडर की ओर ध्यान गया और देखा रामनवमी अर्थात भगवान श्री राम का जन्मदिन निकट आ रहा है. इस से कुछ महीनों पहले घटी एक घटना का स्मरण हुआ.

रात्रि के भोजन के कुछ समय पश्चात पलंग पर लेटे लेटे बेटा कहने लगा की पिताजी मै नहीं सोऊंगा, नींद नहीं आ रही है. वो आप कभी कभी गाना सुन रहे थे वो फिरसे लगाईये, थोडी देर सुनूंगा. बहुत अच्छा है, ऐसा गाना तो कोई गा नही सकता." छोटा है, मेरे समझ के अनुसार वह कहना चाह रहा था कि बहुत अनुठा गाना है.

वैसे वो कोई गाना नहीं था, तुलसीदासजी लिखित रामस्तुती "श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्" थी. मै जो सुन रहा था उसे गायकों ने थोडा तेज गति से गाया था. केवल २ मिनट की होगी. मैने जैसे ही वो लगाई, समाप्त होने से पहले ही मुख पर समाधान के भाव लिये बेटेजी एकदम शांती से सो गये थे.

बहुत अचरज हुआ, इस कारण कि अगर वो सोना नहीं चाहता तो नहीं सोता, चाहे कितनी भी नींद आ रही हो.

कुछ दिनों मे बेटेजी को इसका मराठी में अर्थ बता दिया. रामस्तुती का अर्थ जानकर बेटेजी को भी बडा आनंद आया.

मेरा मानना है हम बच्चों को ऐसी हमारे भगवान, उनके अवतार, तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं संस्कृती से जुडी कहानियां, स्तोत्र, या गाने सुनाते रहना चाहीए क्योंकि इस प्रकार के ऑडियो/विज्युअल संस्कार आज के समय में बच्चों मे मन पर गहरा असर करते हैं. फिर न कोई वामी इन पर असर कर पायेगा न अधर्मी.

का कही?!

© मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन कृ. ४, शके १९३९

Sunday, March 4, 2018

रावण का उदात्तीकरण, रामनवमी, रक्षाबंधन, दशहरा, और हम

कई दिनों से इस विषय पर लिखना चाहता था, लेकिन अब रक्षाबंधन का त्यौहार करीब आ रहा है, और इस विषयपर नकारात्मक पोस्ट्स का सैलाब-सा आएगा, इसलिए लिखना आवश्यक मानता हूँ! गत कई दिनों से रावण की बड़ाई, और राम पर दोषारोपण करनेवाला एक व्होट्सऐप सन्देश चल रहा है, और कई लोगोंके पास उस में उठाए मुद्दोंपर कोई जवाब नहीं है. उस सन्देश में एक लडकी अपनी माँ से कहती है, कि उसे रावण जैसा भाई चाहिए, राम जैसा नहीं! राम ने सीता का त्याग करना, और रावण का अपनी बहन शूर्पनखा के लिए युद्ध कर अपने प्राणोंका बलिदान देना, इतना ही नहीं, सीता हरण के पश्चात् उसे स्पर्श तक नहीं करना, इन सब बातोंको इस के कारण के स्वरुप बताती है. माँ यह सुन कर अवाक रह जाती है.

अब हम इसमें से एक-एक मुद्दे की बात करेंगे. पहला मुद्दा सीता के त्याग का.

मूलत: सीता के त्याग का प्रसंग ‘उत्तर रामायण’ (उत्तर काण्ड) में पाया जाता है. ‘उत्तर’ इस संस्कृत शब्द का अर्थ होता है ‘के पश्चात’, जैसे आयुर्वेद में ‘उत्तरतंत्र’ पाया जाता है. यह उत्तरतंत्र मूल संहिता में किसी और लेखक ने जोड़ा होता है. संक्षेप में कहे, तो मूल रामायण की रचना के पश्चात उत्तर रामायण उस में जोड़ दिया गया है, और महर्षी वाल्मीकि उस के रचयिता है ही नहीं! उनका लिखा रामायण युद्धकाण्ड पर समाप्त होता है. रामायण की फलश्रुती युद्धकाण्ड के अंत में पायी जाती है, यह बात भी इसका एक प्रमाण है. किसी भी स्तोत्र के अंत में फलश्रुती होती है. फलश्रुती के समाप्ति पर रचना समाप्त होती है, यह सादा सा नियम यहाँ भी लागू होता है.

जो बात मूल रामायण में है ही नहीं, उसे बेचारे राम के माथे मढ़ने का काम यह ‘उंगली करनेवाले’ लोग करते है. लेकिन ऐसा करते हुए सीतामाता के धरणीप्रवेश के बाद प्रभु रामचन्द्रजी ने किए विलाप का जो वर्णन उत्तर रामायण में आता है, उसे वे आसानी से भुला देते है. पूरी रामायण पढ़े बगैर खुदको अक्लमंद साबित करने के लिए कपोलकल्पित बातोंकी जुगाली करने का काम करते है ये विद्वान!

कुछ अतिबुद्धिमान लोग कहेंगे, कि लव और कुश का क्या? क्या उनका जन्म हुआ ही नहीं? और उनका जन्म वाल्मीकी आश्रम में हुआ था, उस बात का क्या?

उसका जवाब यह, कि राम और सीता अयोध्या लौट आने के बाद उनके संतान नहीं हो सकती क्या? कैसे कह सकते है, कि लव और कुश का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ था? उनका कोई जन्म प्रमाणपत्र है क्या?

फर्ज कीजिए, सीता को वन में भेज दिया गया था. क्या हम उसका कारण सिर्फ यह दे सकते है, कि ‘राम ने सीता का त्याग किया’? क्या कुछ दूसरा कारण नहीं हो सकता? धार्मिक मामलों में राजा के सलाहगार, कभी कभार तो डांट तक देनेवाले ऋषिमुनी सामान्य जनता के बनिस्पत निश्चय ही कहीं ज्यादा कट्टर होंगे. इसलिए, इस बात की संभावना लगभग न के बराबर है, कि सीता को वाल्मीकि आश्रम भेजने का निर्णय किसी की सलाह के बगैर लिया गया हो. आज के सन्दर्भों में सोचा जाए, तो उसे गर्भावस्था में अधिक सात्त्विक, निसर्गरम्य वातावरण में दिन बिताने के लिए भेजा जाना ही तर्कनिष्ठ लगता है. जिस सीता को चरित्रहीन होने के शक में त्यागा गया होता, उसे आम लोगोंसे ज्यादा ‘सनातनी’ ऋषिमुनि, साधूसंत अपने आश्रम में आराम से कैसे रहने देते? इस बारे में न तो उत्तर रामायण के रचनाकारोंने सोचा, न आज राम पर तोहमत लगाने वाले नकलची सोच रहे है.

अब अगर-मगर वाली भाषा थोड़ी परे रखते है. स्वयं सीतामाता को इच्छा हो रही थी कि उनके बच्चोंका जन्म ऋषि-आश्रम में हो, ऐसा रामायण में ही लिखा है! अब कहें!!!

अब रावण की ओर रुख करते है. रावण एक वेदशास्त्रसंपन्न विद्वान था, वीणावादन में निपुण कलाकार था, यह बात सच है. लेकिन सिर्फ यही बात उसे महान नहीं बनाती. याकूब मेमन एक चार्टर्ड अकाउंटेंट था, ओसामा बिन लादेन सिव्हिल इंजिनियर था. कई और आतंकी उच्चशिक्षित थे, और कई अन्य जीवित आतंकी भी है. उनकी शिक्षा का स्तर उन्हें महान नहीं बनाता. हम आज भी समाज में देख सकते है कि लौकिक शिक्षा सभ्यता का मापदंड नहीं हो सकती.

रावण महापापी था, लंपट था. उसकी नजर में स्त्री केवल भोगविलास की वस्तु थी. रावण ने सीता को न छूने के पीछे भी उसका एक पापकर्म छुपा हुआ है. एक दिन रावण देवलोक पर आक्रमण करने जा रहा था, और कैलास पर्वत पर उसके सैन्य ने छावनी बनाई हुई थी. उस समय उसने स्वर्गलोक की अप्सरा रम्भा को वहां से गुजरता देखा. उसपर अनुरक्त रावणने उस के साथ रत होने की इच्छा प्रकट की. (व्हॉट्सअॅरप नकलची लोगों के लिए आसान शब्दों में:- उसके साथ सोने की इच्छा प्रकट की). लेकिन रम्भा ने उसे नकारते हुए कहा, “हे रावण महाराज, मैं आप के बन्धु कुबेर महाराज के पुत्र नलकुबेर से प्यार करती हूँ, और उसे मिलने जा रही हूँ. तस्मात् मैं आप की बहू लगती हूँ. इसलिए, ऐसा व्यवहार आप को शोभा नहीं देता!”

रम्भा के इस बात का रावण पर कुछ भी असर नहीं हुआ. कहते है, कि कामातुराणां न भयं न लज्जा! रावण बोला – “हे रम्भे, तुम स्वर्गलोक की अप्सरा हो. अप्सराएं किसी एक पुरुष से शादी कर के बस नहीं सकती. तुम किसी एक की हो ही नहीं सकती!” ऐसी दलील दे कर रावण ने रम्भा का बलात्कार किया. कुबेरपुत्र नलकुबेर को जब इस बात का पता चला, तब क्रोधित हो कर उसने रावण को शाप दिया, कि तुमने रम्भा की इच्छा के बगैर उस का बलात्कार किया है, इसलिए आगे से तुम किसी भी स्त्री से उस की अनुमति के बगैर सम्बन्ध नहीं बना पाओगे. अगर तुमने ऐसा किया, तो तुम्हारे मस्तक के सात टुकडे हो कर तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी.

इसी कारणवश सीता को प्रदीर्घ काल तक कारावास में रखने के बावजूद रावण उसे स्पर्श तक नहीं कर सका. इस बात में उसकी सात्त्विकता नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी नजर आती है. ठीक वैसे ही, जैसे आप सिग्नल पर पुलिसवाला तैनात देख कर चुपचाप रुक, अपनी बाइक जेब्रा क्रासिंग के पीछे ले जा कर भोली सूरत बना लेते हो!

इसीलिए रावण सीता को सिर्फ जान लेने की धमकी दे सका. अनगिनत मिन्नतों के बावजूद सीता को जब वश कर न सका, तब अभिशप्त रावण ने सीता को एक साल की मोहलत दी, और कहा, की एक साल के भीतर अगर वह रावण से सम्बन्ध बनाने के लिए राज़ी न हुई तो वह उसकी हत्या कर देगा. जब हनुमान सीता से मिलने लंका गए, तब उन्होंने रावण ने सीता से “अगर तुम मुझसे अपनी मर्जी से सम्बन्ध बनाने के राज़ी न हुई तो दो महीनों के बाद मैं तुम्हारी हत्या कर दूँगा!” ऐसा कहते सुना था.

रावण सिर्फ चाटुकारिता भरी बातें सुनने का आदि था. बड़े-बुजुर्ग और हितचिंतकोंसे सलाह लेना वह हत्थक समझता था. इसलिए उसने सीतामाता को वापस भेजने और राम से शत्रुता न मोल लेने की सलाह देनेवाले अपने सगे भई बिभीषण को उसने देशनिकाला दे दिया. मंत्री शुक और खुद के दादा माल्यवान, दोनों की सही, लेकिन पसंद न आनेवाली सलाह ठुकरा कर उनको भी दूर कर दिया.

इसके ठीक विपरीत राम ने पिता के दिए वर का सम्मान करते हुए वनवास जाना पसंद किया. इतना ही नहीं, वापस बुलाने के लिए आए भाई भरत को उन्होंने राज्य की धुरा सौंप वापस भेज दिया था.

ऐसा कहा जाता कि बहन शूर्पनखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने राम से युद्ध किया. लेकिन उसी बहन के साथ रावण के बर्ताव पर कोई ध्यान नहीं देता. शूर्पनखा का वास्तविक नाम मीनाक्षी था. जवान होने पर उसने अपनी मर्जी से, रावण की अनुमति के बगैर दुष्टबुद्धि नाम के असुर के साथ विवाह तय कर लिया. दुष्टबुद्धि महत्वाकांक्षी था. रावण को ऐसा डर था कि इस शादी के पीछे दुष्टबुद्धि की मंशा रावण का राज्य हथियाने की थी. इसलिए रावण इस विवाह के खिलाफ था. लेकिन जब पत्नी मंदोदरी ने उस से प्रार्थना की, कि बहन की इच्छा मान ली जाए, रावण पसीज गया, और विवाह की अनुमति दे दी. लेकिन रावण के मन में गुस्सा अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था. इसी के चलते बाद में उसने दुष्टबुद्धि पर हमला कर उसे मार डाला. इस बात को हम आज के समय में क्या कहते है? हां, सही पहचाना हॉनर किलिंग! क्या बहन के पति की हत्या करने वाला रावण आप को महात्मा और आदर्श भई प्रतीत होता है?

ज़ाहिर है कि इस बात से शूर्पनखा बड़ी व्यथित हो उठी. प्रतिशोध की भावना उसके मन में धधक उठी. अपने पति के हत्या के प्रतिशोध के लिए वह तड़पने लगी. ऐसे में इधर-उधर भटकते हुए उसे राम और लक्ष्मण इन रघुकुलके दो वीर पुरुष दिखाई दिए, और उस के मन में पनपती प्रतिशोध की भावना ने एक षडयंत्र पैदा हुआ. पहले राम और बादमें लक्ष्मण के प्रति अनुराग दिखाने वाली शूर्पनखा जब सीता पर झपटी, लक्ष्मण ने उसे रोक उस के नासिका और कर्ण छेद दिए. इस बात की शिकायत उसने पहले उसके भाई राक्षस खर से की. खर और दूषण दक्षिण भारत में रावण के राज्य की रखवाली करते थे. इन दो राक्षसों ने राम और लक्ष्मण पर हमला किया, और राम-लक्ष्मण ने उन का बड़ी आसानी से पारिपत्य किया. रावण का राज्य थोड़ा ही क्यों न हो, कुतरा गया, इस विचार से हर्षित शूर्पनखा रावण के सम्मुख राम और लक्ष्मण की शिकायत ले गई. अब रावण प्रचंड क्रोधित हुआ. क्यों कि राम-लक्ष्मण ने उसके राज्य में सेंध लगाकर उसकी बहन को विरूप किया, और उसके दो भाईयोंकी ह्त्या की थी. अब तक बहन के सम्मान के बारे में पूर्णतया उदासीन रावण अपने राज्य पर हमले की बात से आगबबूला हो गया, और प्रतिशोध स्वरुप उसने राम की पत्नी सीता का अपहरण किया. आगे का घटनाक्रम सर्वविदित है, मैं उसे दोहराना नहीं चाहूंगा!

रावण की हवस के बारे में और एक कथा है. एक दिन हिमालय में घूम रही रावण को ब्रह्मर्षी कुशध्वज की कन्या वेदवती दिखाई दी. स्वभाव से ही लंपट रावण का उस पर लट्टू हो जाना कोई आश्चर्य की बात न थी. उसे देखते ही रावण ने उस से बात करने की कोशिश की, और पूछा, कि वह अबतक अविवाहित क्यों थी. उसने रावण को बताया कि उसके पिता की इच्छा उसका विवाह भगवान विष्णु से करने की थी. इसका पता चलते ही वेदवती की चाहत पाने के इच्छुक एक दैत्यराज ने उनकी हत्या कर दी. पति की हत्या में ग़मगीन उस की माँ ने भी अपनी जान दे दी. तब से अपने पिता की इच्छा की पूर्ति के लिए वह श्री विष्णु की आराधना कर रही थी. अनाथ और जवान कन्या देख कर रावण का मन डोल गया और उस ने उससे उसे अपनाने की प्रार्थना की. लेकिन वेदवती का निश्चय अटल था. उसने रावण को मना कर दिया. रावण अपनी फितरत के अनुसार उसके बाल पकड़ कर उस पर जबरदस्ती करने की कोशिश करने लगा. वेदवती ने अपने बाल काट कर खुद को छुड़ा लिया और अग्निप्रवेश कर जान दे दी. मरते हुए उसने रावण को श्राप दिया कि “मैं तो अब मर जाऊंगी, लेकिन मैं फिर से जन्म ले कर तुम्हारे मृत्यु का कारण बनूँगी”!

इसके आगे की कहानी कई पर्यायों में है. एक में अग्निप्रवेश कर चुकी वेदवती को अग्निदेव बचा लेते है, और उसे अपनी पुत्री की तरह पालते है. बाद में जब रावण सीता का हरण कर ले जा रहा होता है, तब वे वेदवती और सीता को आपस में बदल देते है, और सीता को अपने पास रख लेते है. बाद में जब सीता राम को यह बात बता कर वेदवती का पत्नी के रूप में स्वीकार करने की बात कहती है, तो राम उसे एक पत्नीव्रत का हवाला दे कर मना कर देते है. तब वेदवती पुन: अग्निप्रवेश करती है. आगे पद्मावती के नाम से जन्म लेने पर वेदवती से विवाह कर श्रीनिवास के रूप में श्रीविष्णु वेदवती के पिता की इच्छा का आदर करते है.

ऐसा भी कहा जाता है कि वेदवती ही सीता के रूप में जन्म ले कर रावण के मृत्यु का कारण बनी. ऐसा है, कि मैं तो खुद उस काल में उपस्थित नहीं था. लेकिन राम पर मनगढ़ंत आरोप करनेवाले हिन्दू द्वेषी भी वहाँ थे नहीं, और उनके अनर्गल संदेशोंको सच मान नक़लचेप करनेवाले बेअक्ल लोग भी तो नहीं थे.

अत: सगी बहन के पति की शक के बिनाह पर हत्या करने वाला और दिखाई पड़ने वाली हर सुन्दर स्त्री का बलात्कार, या वैसी कोशिश करनेवाला रावण आजके बहन का आदर्श कैसे हो सकता है, यह बात मेरे समझ के परे है!

रावण की अगर तुलना करनी ही है, तो वह आज के बिल क्लिंटन, टायगर वुड्स या वैसे ही लंपट बलात्कारी से हो सकती है. सत्ता के लिए, कुर्सी बचाकर रखने के लिए जी-जान की कोशिश करने वाले आधुनिक स्वयंघोषित कमीने राजनेताओं से हो सकती है. अनेक प्रलोभनों का सामना कर आखिर तक एक-पत्नि-व्रत का पालन करने वाले राम से तो हरगिज नहीं हो सकती.

पाठकों, आप एक बड़े षडयंत्र का शिकार हो रहे है. कई तरीकोंसे हमारे मानसपटल पर यह अंकित करने की कोशिश हो रही है कि हर भारतीय चीज बेकार है. हर त्यौहार के बारे में वह त्यौहार कैसे प्रदूषण फैलाता है, कैसे प्राकृतिक संसाधनों का नाश करता है, ऐसी बाते फैलानेवाले सन्देश सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे है. भारतीयोंके श्रद्धास्थान राम, कृष्ण, इनपर छींटाकशी के प्रयास होते है, इतना ही नहीं, डाक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे ऋषितुल्य व्यक्तित्व को “Bomb Daddy” और संघ का लड़ाकू अजेंडा आगे ले जाने वाले भारतीय पुरुषसत्ताक पद्धति का पुरस्कर्ता कहा जाना वगैरह इसमें शामिल है. अगर यकीन न हो तो राजदीप सरदेसाई की पत्नि सागरिका घोष के लेख आन्तरजाल पर खोज कर देखें.

दुर्भाग्यवश हम भारतीयों की एक बुरी आदत है – आत्मक्लेश, आत्मपीडा! इस बारे में डाक्टर सुबोध नाइक का लिखा हुआ एक परिच्छेद उद्धृत करना चाहता हूँ: “खुद में अपना परीक्षक होना अपनी प्रगति के लिए बड़ी अच्छी बात है. लेकिन आप के अन्दर का यह समीक्षक कब आप का मूल्यमापन करने से आप का अवमूल्यन करने पर उतरता है, इसका आप को कई बार पता ही नहीं चलता. खुद के हर बात पर आप खुद को सिर्फ गरियाते है. “मेरे पास कुछ भी मूल्यवान नहीं है, मैं कभी अच्छा था ही नहीं” ऐसा आप का विश्वास बनता जाता है. खुद को गरियाए बगैर आप को अच्छा ही नहीं लगता. एक तरह से आप आत्मक्लेशक (masochist) बनते हो, और इसी में आप खप जाते हो. तब साक्षात ब्रह्मदेव भी आप की सहायता नहीं कर सकते.

जैसे यह निजी स्तर पर होता है, वैसे ही राष्ट्रीय स्तर पर भे होता है.”

प्रभु रामचंद्र साक्षात मर्यादा पुरुषोत्तम थे. उनके पैर के नाखून तक की हमारी औकात नहीं है. इसलिए इस तरह की आत्मक्लेश सहाय्यक अलगाववादी ताकतोंको प्रोत्साहन न दें. राम की आड़ में हिन्दुओं के श्रद्धास्थानों पर निशाना लगाने वाली ताकतों को बल न दें!

जाते जाते बता दूँ, शम्बूक वध की कहानी भी मूल रामायण में नहीं है!

संदर्भः
१) वाल्मीकी रामायण
२) **वैद्य परीक्षित शेवडे, डोंबिवली
३) डॉ सुबोध नाई़क
४) रामायण संबंधीत अनेक स्त्रोत

मूल लेखकः श्री मंदार दिलीप जोशी
हिंदी भाषांतर/रूपांतरः श्री कृष्णा धारासुरकर

https://goo.gl/L6L32z

Wednesday, February 21, 2018

कोमलप्रीत कौर - एक सक्षम महिला



कोमलप्रीत कौर इस नाम से क्या आप परिचित है? नहीं?

चलिये ठीक है, गुरमेहर कौर यह नाम तो आपको ज्ञात होगा ?  महिला सक्षमीकरण इस संज्ञा से भी आप अवश्य परिचित . वामपंथीयों तथा पोषित मिडिया एवं स्वयं गुरमेहर कौर की माने तो वह सोशल मिडिया के ट्रोल्स से 'लडने' के बाद  एक अत्यधिक 'सक्षम महिला' के रूप में खडी है. इस लडाई को लडकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा फडकता हुआ रखने का श्रेय ले चुकी मिडिया की लाडली बच्ची गुरमेहर कौर का सबको स्मरण है और उसे महिला सक्षमीकरण के उदाहरण के तौर पर हमारे सामने अनगिनत बार नचाया जाता है.

अब आपको बतलाता हूं कोमलप्रीत कौर कौन है. कोमलप्रीत कौर कारगिल के युद्ध के हुतात्मा सिपाही बूटा सिंग की बेटी है. गरिबी से झगडते हुए कोमलप्रीतने अपनी पढाई पूरी की, पंजाब मेडिकल एन्ट्रन्स एग्झाम में अव्वल नंबरों से उत्तिर्ण हुई, और अब एम.बी.बी.एस.की शिक्षा ले रही वास्तविक रूप में सक्षम लडकी है कोमलप्रीत.

केवल बीस साल कि आयु में सेना में दाखिल हुए कोमल के पिता बूटा सिंगने जब कारगिल में लडते लडते अपनी जान देश के लिये न्योछावर कर दी, तब वे केवल छब्बीस वर्ष के थे. वे पीछे छोड गये अपनी केवल चार महीने की बेटी कोमलप्रीत एवं केवल बीस वर्ष की पत्नी अमृतपाल कौर को. केवल दो बार दो महिनों के छुट्टी पर आये अपने पती बूटा सिंग की अमृतपाल कौरजी के मन में केवल कुल चार महिनों की स्मृतियां हैं. अपने पती के इस जग से चले जाने के दुख को अपने मन मे रख अमृतपाल कौरजीने अपनी बेटी के भरणपोषण एवं शिक्षा पर ध्यान देने का निश्चय किया, जिसके फलस्वरूप आज कोमलप्रीत आज एक चिकित्सक (डॉक्टर) होने के पथ पर अग्रेसर है.

परंतु आज कोमलप्रीत को कोई नहीं जानता. क्योंकि कोमलने अपने हाल के लिये न तो युद्ध को उत्तरदायी ठहराया, न वो अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता का झंडा उठाकर नाची. न उसने सोशल मिडिया पर रोनाधोना किया. आज कोमलप्रीत अपनी मां के एवं स्वयं अपने कष्टों के आधार पर एक डॉक्टर होने की राह पर है,

जिंदगी की लडाई, संघर्षपूर्ण जीवन यह शब्द आजकल बहुत सस्ते हो गये है, क्योंकि आजकल मिडिया तथा वामपंथी कुबुद्धीवादीयों ने सोशल मिडिया पर ट्रोल्स से लडना इस बात को ग्लॅमर एवं महत्त्वपूर्ण बना दिया है जैसे कुछ अक्षर टाईप करना या किसी को म्युट या ब्लॉक करना यह कोई शौर्य का प्रतीक हो. परंतु जिंदगी की लडाई, जीवन का संघर्ष इन्हीं शब्दों का जीवित उदाहरण है कोमलप्रीत का जन्म से लेकर आजतक का जीवन.

गरिबीसे उभरकर परंतु किसी घातक विचारधारा की कठपुतली न बनकर जीवन में यशस्विता प्राप्त करनेवाले किसी के प्रति न तो आजकलके मिडीया एवं वामपंथीयों को कोई ममत्व है न भूतकाल में कभी था.

काँग्रेसने उनके खडे किये गये पोषक व्यवस्था का यही वैशिष्ट्य है कि जहां आज गुरमेहर जैसी जोकरछाप अपरिपक्व व्यक्ती को आज लोगों के सामने आदर्श व्यक्तिमत्व के रूप में देश के सामने प्रस्तुत किया जाता है, वहीं कोमलप्रीत कौर जैसे सही मायने में सक्षम महिलाओं को गुमनामी के अंधेरे मे रखा जाता है.

ऐसी सक्षम कोमलप्रीत कौर को आगे की मेडीकल शिक्षा के लिये अनेक शुभकामनाएं एवं उनकी माताजी अमृतपालजी को शत शत नमन.

© मंदार दिलीप जोशी
फाल्गुन शु. ६, शके १९३९

Tuesday, June 20, 2017

राष्ट्रपतीपद का चुनाव एवं विरोधियों की तिलमिलाहट

ज्ञान न पूछो वामी का, पूछ लीजिये जात।
दलित क्यों नहीं पॉलिटब्यूरो में, पूछो मार के लात !

हमेशा आपको आप हजारों सालों से गुलाम (दास) हैं यह कुछ समाजोंघटकों के  मन पर पीढी दर पीढी बिंबित करते रहना, फिर उस संदर्भ में आपको इस तथाकथित दास्यत्व से बाहर आना आवश्यक है यह बार बार समझाना, एवं उस पश्चात आपको इस तथाकथित दास्यत्व से बाहर निकालने हेतू सातत्यपूर्ण ढंग से एक काल्पनिक शत्रू को आपके सामने खडा करना, उदाहरण किसी एक समाज को लक्षय करके - प्रथमत: वैचारिक और उस पश्चात सामरिक विद्रोह के लिये आपको प्रवृत्त करना यह वामपंथी/साम्यवादी/नक्षलवादी मानसिकता के लोगों का प्रयत्न रहा है. फिर जिन्हें ये गुलाम बतलाने इच्छुक हैं वो समाज अथवा व्यक्ती कितना भी कौशल्यविकसित, उच्चशिक्षाप्राप्त, एवं समृद्धी की ओर अग्रेसर क्यों न हो!

कल राष्ट्रीय लोकतंत्र मोर्चा (एन.डी.ए.) के राष्ट्रपतीपद के प्रत्याशी के नाम की घोषणा होते ही जो विरोधक, वामपंथी/साम्यवादी/नक्षलवादी एवं उनके समर्थक, तथा बिकाऊ मिडीया एवं उनके सोशल मिडीया पर पडे खच्चरों की निराशा से उत्पन्न बैचैनी और विषवमन दृग्गोचर हो रहा है वह इस बात पर है की अब सारे दुनिया को पता चल जाएगा कि संघ है क्या. यह बात कोई रोकॅट साईन्स तो नहीं थी कि भारतीय जनता पक्ष सर्वसहमती के हेतू एक दलित, उच्चशिक्षित, राजनीतीका अनुभवी, एवं संघ की विचारधारा रखने वाला कोई प्रत्याशी की खोज कर रही थी.

श्री रामनाथ कोविंदजी इन सारे निकषों में खरे उतरते हैं. वे दलित हैं, इतना ही नहीं वे गरीब किसान कुटुंब से आते हैं, दिल्ली उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में वे १६ वर्ष वकील थे, आय.ए.एस. परीक्षा उत्तीर्ण हैं, कुछ शैक्षणीक संस्थाओं के व्यवस्थापक भी रहें हैं, केवल इतना ही नहीं उन्हे संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत का प्रतिनिधित्व करने का एवं  संयुक्त राष्ट्रसंघके आमसभा को संबोधित करनेका भी अनुभव प्राप्त है. संघी है तो पृथक बताना आवश्यक नहीं कि उन्हें सामाजिक कार्य में रुचि है अपितु अनुभव भी प्राप्त है. अब कुछ वर्षों से वे बिहार के राज्यपाल हैं. हां, यह वहीं है, जिन्होनें "अपेक्षित" के स्थान पर "उपेक्षित" कहने पर तेजस्वी यादव को पूरी शपथ पुन: पढने का आदेश दिया था.

परंतु उपरोक्त विरोधकों को यह बात पच नहीं रही की ऐसा व्यक्ती एक संघी है. हेतूपूर्वक इस शब्द का प्रयोग किया है क्योंकी बिकाऊ पत्रकारों को और संघ के अंधविरोधकों को इस शब्द का उपयोग करने के अभ्यस्त हैं. ये संघ के समर्थक ही नहीं अपितु संघ विरोधकों को भी ज्ञात है कि संघ मे किसी की जाति पूछी तक नहीं जाती, एवं नहीं साथ साथ संघ शाखा में जाने वाले लोगों मे जाती कोई महत्व नहीं रखती. इतना ही नहीं अनेक विजातीय संघ कार्यकर्ताओं के आपस में केवल रोटी ही नही बेटी व्यवहार भी हैं.

आज तक संघ को सातत्य से ब्राह्मणो एवं उच्च जातीयों के संगठन  के रूप में संघकार्य से अपरिचित जनमानस के मन पर बिंबित करने में इन अंधविरोधकों नें कोई कसर नहीं छोडी थी. इसको पहली चोंट तब पहुंची जब श्री नरेन्द्र मोदी जो किसी तथाकथित उच्च जाती से संबंध नहीं रखते वे प्रधानमंत्री बने. परंतु उनका विरोध करने के हेतू विरोधकों के पास अन्य विषय थे.  श्री रामनाथ कोविंदजी के विषय में ऐसा कुछ भी नहीं है.

विरोधीयों का दु:ख यह है कि इस बार राष्ट्रपतीपद के प्रत्याशी के दलित एवं संघी होने के कारण अब संघ एवं भारतीय जनता पक्ष के चारित्र्यहनन के लिये उनको जाती का आधार कैसे मिलेगा? मिडीयाकी जो तिलमिलाहट दृग्गोचर हो रही है, वह इस हेतू है की सालों पुराने संघ एवं भाजपा के दलितविरोधी होने की कहानियों की बाढ लाने मे वे इस बार पूरी तरह से असफल रहे हैं. अब यह बात विश्व के सामने बार बार आयेगी की भारतवर्ष का राष्ट्रपती दलित है एवं संघी भी है. अर्थात, यह बात विश्व को दृग्गोचर होगी की संघ जातीवादी तो है ही नही, अपितु संघ हर जाती के लोगों को राजनीती में उच्च स्थान प्राप्त कर देशसेवा करने हेतु समान अवसर प्राप्त कराता है.

मिडिया की इस छटपटाहट से हर राष्ट्रवादी भारतीय को गुदगुदी तो अवश्य हो रही है. मुझे भी होना आश्चर्य की बात नहीं. आप भी मजे लिजीये.

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।

महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।

।। भारत माता की जय ।।

|| वंदे मातरम् ||

© मंदार दिलीप जोशी
जेष्ठ कृ. १०, शके १९३९ | योगिनी एकादशी

Thursday, March 9, 2017

गुरमेहर से सुहाना तक, सैफुल्ला के वालिद से होते हुए

कुछ लोगों के मन में उठा प्रश्न सटीक है - पहले भी मुस्लिम गायक हिंदू देवदेवताओं के स्तुतीपर गीत गा चुके हैं, तो फिर सुहाना के ऐसा करने पर बवाल क्यों?

मेरा आकलन यह है कि जब जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है.  अर्थात एम.एस.एम यानी मुख्यधारा के प्रसारमाध्यम एवं सोशल मिडिया पे कोई भी ट्रेन्ड यूंही नहीं चलता.  इसे अलग परिपेक्ष्य में देखना पडता है.  यहां कुछ भी समय से पहले, नसीब से ज्यादा, और कारण के अभाव में नहीं होता.

कुछ दिनो पहले ही गुरमेहर कौर की ट्विट से उठा बवाल आपको ज्ञात ही होगा.  उसने ट्विट में कहा था की मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, युद्ध ने मारा.  इस बात पर राष्ट्रवादी गुस्से हो कर उसपे टूट पडे और मुख्यधारा के प्रसारमाध्यम एवं सोशल मिडिया पर मंडरा रहे असुर प्रकृति को अवसर मिल गया की कैसे देश मे असहिष्णुता एवं विचारस्वातंत्र्य का दमन हो रहा है.  किंतु जब वे भी जानते थे और आप-हम भी जानते हैं कि यह केवल अपने विचारों को प्रकट करने का विषय नहीं था.  अगर आप किसी पक्ष या व्यक्ती को कोसें तो वह विचारस्वातंत्र्य के अंतर्गत आ सकता है.  लेकिन गुरमेहर के इस ट्वीट का अन्वयार्थ यह था कि आज तक भारत के जितने भी सैनिक एवं और लोग मारे गये,  उन सब की मृत्यू का भारत एक देश के रूप में उतना ही उत्तरदायी है जितना पाकिस्तान.  अतः भारत को शांती प्रक्रिया को आगे ही बढाना चाहीये.  अब यह बात कितनी बचकानी एवं झूठी है यह तो आपको बताने की आवश्यकता नहीं है.  चूंकि अब मुख्यधारा के प्रसारमाध्यमों का दबदबा उतना नहीं रहा, इस बात की जमकर और विभिन्न कोणों से आलोचना हुई.  गुरमेहर एक लडकी है और केवल २० वर्ष आयु की है यह कुतर्क भी उसे बचा न पाये.  विरोध इतका बढ गया कि गुरमेहर को उसे किसीने बलात्कार की धमकी दी है ऐसा बोलना पडा.  इससे उसके विरोध में बोलने वालों में ही फूट पड गयी, और कईं लोग केवल इस धमकी वे विषय में क्यों न हो, गुरमेहर की तरफ हो लिये.  आखिर एक लडकी की इज्जत का सवाल था न! लेकिन बाद में जब यह ज्ञात हुआ कि उसे बलात्कार की धमकी देने वाला उसी के लिबरल गिरोह वाले किसी विद्यार्थी संघटन का सदस्य था, तो यह बात जैसे उछाली गयी थी उससे दोगुने गति गायब भी हो गयी.  फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी संघटन के सदस्योंने ही पुलिस  में केस दर्ज करवाया.

खैर, आप को जो तथ्य पहले से ज्ञात हैं उन्हें फिरसे आप के सामने रखने के कारण क्षमाप्रार्थी हूं, परंतु सुहाना का दमन उछाले जाने के कारण तक पहुंचना है तो हमें गुरमेहर के विषय को थोडा देखना होगा इस कारण यह इतिहास लेखन करना पडा.  तो सुहाना का किस्सा क्या है? सुहाना सईद ने एक कन्नडा रियलिटी शो में एक हिंदू भक्तीगीत गाया था.  मैं इस गायक से अनभिज्ञ हूं लेकिन इस विषय में अधिक जानकारी लेने हेतु उसके एक दो गाने सुने.  भाषा तो समझ नही आयी परंतु यह ज्ञात हो गया की यह एक प्रसिद्ध गायिका है और लोगों को इसके गाने पसंद आते हैं.  तो सुहाना ने एक रियलिटी शो में एक हिंदू भक्तीगीत गाया और इसके पश्चात शुरू हुआ इस्लामियों की ओर से उसपे धमकीयोंका सत्र.  उसके विरोध में वही पुराने तर्क सुनने मिले की इन लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिये क्योंकि देखो इस्लाम कितना अच्छा एवं शांतीपूर्ण धर्म है इत्यादि.  लेकिन सबसे बडा कुतर्क यह देखा गया की अगर गुरमेहर को अपनी बात रखने का अधिकार है तो सुहाना सईद को भी उसके जो मन मे आये वह गाने का अधिकार है. 



यूं तो महंमद रफी से लेकर कईं मुसलमान गायकों ने, इतनी पुरानी बातें छोड़िए , आजकल के गायकों ने भी हिंदू भक्तीगीत गाए हैं, तब तो कोई बवाल खडा नहीं हुआ, तो अब क्यों इसका उत्तर आप को अब तक संभवतः मिल गया होगा.  गुरमेहर मामले मे ठंडे किये गये मुख्यधारा माध्यक तथा सोशल मिडिया में लिबरल भाडे के टट्टूओं को गुरमेहर के नाम पर लगे धब्बे को धोने का अवसर चाहिये था, तो फिर वह क्या करते.  सारी दलीलें तो समाप्त हो चुकी थीं.  तो अचानक उनकी नजर एवं कान पडे सुहाना के गाए हुए हिंदू भक्ती संगीत पर.  

लिबरल गिरोह का मस्तिष्क टेढा ही चलने के कारण उन्होंने गुरमेहर की विषैले फल समान बात को, जो विष अब देश के कुछ विश्वविद्यालयों के कईं युवाओं मे फैल चुका है, उसे सुहाना के हिंदू भक्तीगीत गाने के अधिकार के समान स्तर पर लाकर खडा कर दिया, की देखो देशवासियों तुम वहां भी गलत थे यहां भी गलत हो.  दोनो ही विचारस्वातंत्र्य का ही हिस्सा हैं.  तो फिर काहे को सुहाना को गरिया रहे हो? क्या अधिकार है तुम्हें? हालाकि यह बात सुहाना को धमकाने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों को कही गयी थी, परंतु इसका लक्ष्य गुरमेहर को विरोध करने वाले ही थे.  कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना.  

देखा आपने कैसे छल तथा चतुराई से दोनो लडकियों को एवं उनके विषयों को समक़क्ष लाकर खडा कर दिया गया?

और हां, अगर आप की सहानुभूति आयसिस के आतंकी सैफुल्ला के बाप से होकर सुहाना सईद की ओर बहने पर आमादा है, तो आप को इसका स्मरण करा दूं कि उसकी गायकी पैसे के लिये एवं कोई प्रतियोगिता मे विजयी होने हेतू है, कोई भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं उमड पडी उसकी.

कुछ समझे?

© मंदार दिलीप जोशी
माघ शु. १३, शके १९३८


Saturday, March 4, 2017

गुरमेहर, समाज, और पालनपोषण

एक पुरानी आफ्रीकी कहावत है, "It takes a village to raise a child."

गुरमेहर बहुत छोटी थी जब इसके पिता काश्मीर मे आतंकवादियों के गोली का शिकार हुए. पेट्रोल पंप एवं मिली हुई बडी धनराशि से आय की समस्या तो हल हो गयी, परंतु पेट्रोल पंप संभालने का काम एवं घर की अन्य जिम्मेदारियों ने कदाचित इसकी मां को इस पर संस्कार करने का अवकाश नहीं दिया, और यह देशविघातक शक्तियों के लिये एक आसान सा लक्ष्य बन गयी.

अगर आपके आसपास ऐसा परिवार हो, तो उनके बच्चों की मित्रता अपने बच्चों से अवश्य करवाएं; ऐसे बच्चों को अपने घर खाने पर बुलाएं; उन्हे अपने साथ मंदिर, सिनेमा, अन्य सार्वजनिक एवं पारिवारिक कार्यक्रमों मे ले जाएं; उन्हे अच्छी किताबें भेंट करें; उनके मित्रपरिवार से परिचित हों; उनकी मां से, या अगर मां नहीं है और पिता हैं तो उनसे, बच्चों के भविष्य के विषय मे चर्चा करें; इत्यादि.

सहाय्यता केवल पैसों से नहीं की जाती.

और हां यह पहले होता था हमारी संस्कृति में, कोई आफ्रीका से आयात की हुई कल्पना नहीं है. आयात केवल कहावत है: It takes a village to raise a child.




 © मंदार दिलीप जोशी

Wednesday, March 1, 2017

वीरमाता - क्या घर घर से शिवाजी निकलेगा?

वीरमाता शब्द जब हम सुनते हैं, तो यहां महाराष्ट्र में हमें पहले तो शिवाजी महाराज की मां वीरमाता जीजाबाई का स्मरण होता है. लेकिन आजकल तो हमारी आकांक्षा घर में शिवाजी पैदा करने की तो रही नहीं. हम सोचते हैं कि शिवाजी पैदा तो हो, लेकिन वो मेरे पडोसी के घर पर हो तो अच्छा. हिंदू घर में बच्चे तो आजकल सिर्फ 'हम दो हमारे दो' के नारे हिसाब से चलते हैं. कईं घरों में तो 'हम दो हमारा एक' ही दिखाई देता है. आजकल तो वामींयों ने "हम औरत हैं तो क्या बच्चे जनना जरूरी है? नहीं चाहीये बच्चा!" यह गंदी सोच फैला रख्खी है. हम सोचते हैं जितने कम बच्चे हो उतना पालनपोषण अच्छा हो सकता है. अरे, थोडा भटक गये हम.

चलिये फिर शिवाजी की बात करते हैं. मुझे इस बात का पूरा यकीन है की अगर आज कहीं शिवाजी महाराज पैदा भी हो गये, तो उनको jingoist (युद्धखोर देशभक्त), हायपर नॅशनलिस्ट, और इस सूची मे ताजा दाखिल हुये  अपशब्द कॉन्स्टिट्युशनल नॅशनलिझम से निश्चित रूप से गरियाया जायेगा. तो बहनजी लेकिन शिवाजी नहीं तो ना सही, कमसे कम सिपाही तो पैदा कर ही सकती हैं ना आप?

आईये ऐसी ही एक वीरमाता की बात करते हैं जिसने एक नहीं, अपितु दो वीर सिपाहीयों को जन्म दिया. उनके पहले बेटे का नाम है......है नहीं, था...सौरभ. हाल ही में एक समारोह में उन्होने जो बातें कहीं वह तो हम सोच भी नहीं सकते.

२००३ के आसपास सेना मे दाखिल हुए सौरभ नंदकुमार फराटे १७ दिसंबर २०१६ को काश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकवादीयों ने सेना के दल पर किये हमले में हुतात्मा हो गये. अपने परिवारसमेत दो महिनों की छुट्टी बिताकर और इस छुट्टी में अपने दोन जुडवा बेटीयों का जन्मदिन मनाकर फिर सेना में अपने नियुक्तिस्थान पर अक्तुबर में लौटे सौरभ की मृत्यू की खबर मिलते ही उसके परिवार तथा पूरे गांव मे दु:ख के घने बादल छा गये.

सकारात्मक खबरें देने वाले एक वेबसाईट भारतीयन्स डॉट कॉम का हाल ही मे एक अ‍ॅप निकला है. उसके उद्घाटन समारोह मे बात करते हुए सौरभ की मां ने कहा, कि अगर सब ऐसा सोचने लगे कि मेरा बेटा इंजिनिअर बनेगा, मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा तो फिर अपने देश की रक्षा के लिये कौन जायेगा? अपना बेटा देश के लिये खोया है तो क्या हुआ, मेरा दूसरा बेटा भी सेना में ही जायेगा. [यह बात ध्यान देने लायक है कि उनका दूसरा बेटा भी उसी जगह नियुक्त है जिस जगह सौरभ की नियुक्ती हुई थी.] और यदि मुझे अवसर मिला, तो मेरा यह ३ वर्ष की आयु का पोता जो है, उसे मैं सेना मे दाखिल करवाउंगी.

सेना में दाखिल दो बेटों में से एक का हुतात्मा हो जाना, दूसरे बेटे का भी उसी स्थान पर नियुक्ती होना जहां उसके भाई की नियुक्ती हुई थी, और यह कहना की अवसर मिलते ही पोते को भी सेना में देश के लिये लडने के लिये भेजूंगी, यह कोई साधारण बात नहीं है. हम में से कोई इतना ऊँचा सोच भी नहीं सकता जितनी ऊँचा  सौरभ की माता की सोच है.

यह पढनेवाले लोगों में से कईं ऐसी होंगी जिनका अभी तक विवाह नहीं हुआ, या नयी नवेली दुल्हन है, या विवाह के पश्चात ज्यादा समय नहीं बीता है, या ऐसी भी होंगी जिनके बच्चे अभी तक स्कूल में पढ रहें है. और कुछ ऐसी भी होंगी जिनके परिवार और परिजनों में ऐये आयुगट की महिलाये होंगी. मै आपसे विनती करुंगा की आप इस विषय में सोचें और ऐसी महिलाओं को भी इस विषय में सोचने की विनती करें. अगर दूरस्थ गांव मे रहने वाले लोगों में पुलीस, सेना, एवं ऐसे ही सुरक्षा दलों मे दाखिल होने को लेकर ऐसी जागरूकता है, तो हम शहर वाले लोग जो अपने आप को ज्यादा परिपक्व समझेते हैं, क्यों नही सेना मे दाखिल होना एक विकल्प बना लेते हमारे बच्चों के लिये?

और हां, मुझे यह ज्ञात है कि केवल सेना में जाना ही देशभक्ति का प्रमाण नहीं है, परंतु यह एक महत्वपूर्ण संस्था है जिसमें अपना योगदान देने के लिये हर नागरिक को सोचना चाहीये.

इससे पहले कि कोई यह पूछे कि भाईसाहब आप अपने बेटे को सेना मे भेजेंगे? तो उसका उत्तर है - हां. मेरा बेटा ४ साल कि आयु से ही सेना मे जाने की इच्छा रखता है, और आज वह ६.५ साल का है और उसका निर्णय बदला नहीं है. हां मृत्यू की उसे बुनियादी जानकारी है, जितनी एक ६-७ साल के बच्चे को होती है. लेकिन फिर भी उसने सेना में जाने के अपने लक्ष्य को छोडा नहीं है. अगर उसने बडा होकर उसकी इच्छा किसी कारणवश बदल गयी, तो हम उसमें दखल अंदाजी नहीं करेंगे. परंतु अगर उसने बडा होने पर यह कहा की मुझे सेना में ही अपना करिअर बनाना है, तो न मैं तो उसे रोकूंगा न उसकी मां, अपितु हम दोनो उसे प्रोत्साहित ही करेंगे. हां अगर बेटी जाना चाहे तो भी.

तो आप सोचिये, आप कैसी माता बनना पसंद करेंगी. "बेटा, बाहर मत खेलो कहीं लग गया तो, ये लो मोबाईल और व्हिडिओ गेम खेलो" ये वाली मां, या खेलकर आये बच्चे के जख्मों पर दवा लगाते हुएं उसके जुझारू वृत्ती का गौरव करने वाली माता बनेंगी?

आरंभ मे एक प्रश्न पूछा था आप से. घर घर से शिवाजी न निकले तो न सही, परंतु सैनिक तो पैदा कर ही सकती हैं ना आप? चलिये कम से कम सोचना तो शुरु किजीये!!

© मंदार दिलीप जोशी

Thursday, February 9, 2017

डर

डर, खौफ, भय...क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता इसकी सूची बडी लंबी है. और अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी.

हर किसी का चढता समय होता है, फिर उसका चरम समय होता है और अंत मे अस्त की ओर जाता ढलता समय. परंतु पेशवा बाजीराव के पराक्रम के केवल पहले दो प्रकार के समय थे, चढता और चरम. उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी पराजय का मूंह तक नहीं देखा. श्रीमंत पेशवा बाजीराव का डर पुरे हिंदूस्थान में फैला हुआ था और उन्हें डर नामकी चीज पता नहीं थी. इसका केवल एक ही उदाहरण प्रस्तुत करता हूं.

यह कथा उस समय की है जब श्रीमंत बाजीराव की माताजी श्रीमंत राधाबाईसाहब साठ वर्ष की उम्र को पार कर चुकी थीं. यह ऐसा समय होता है जब मनुष्य को अपने जीवन का दूसरा किनारा नजर आने लगता है और तीर्थयात्रा की इच्छा होने लगती है. श्रीमंत राधाबाईसाहब को भी औरों की तरह यही अनुभूती होने लगी थी. इस यात्रा में चार महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल समझे जाते थे और वह थे मथुरा, गया, प्रयाग, एवं काशी.  इस यात्रा को काशीयात्रा कहा जाता था और उसका कारण था काशी का अंतिम पडाव होना. काशी में अगर यात्री की मृत्यू हो तो उसकी आत्मा का मोक्ष सुनिश्चित माना जाता था.

यह बात ध्यान मे रखिये की उस समय यातायात के साधन बहुत कम थे और कोई भी लंबी यात्रा खतरों से भरी रहती थी. यह तीर्थस्थान मुघल प्रदेश और उनके नियंत्रण में होने के कारण यात्रा से बिना कोई नुकसान पहुंचे लौटना बहुत ही कठीन था. अपने राज्य से बादशाही प्रदेश में जाना बहुत ही खतरनाक इस लिये भी था क्योंकी मुघल सरदार या किसी और राजा के सैनिकों से जान और माल दोनों को खतरा बना रहने के साथ साथ घने जंगल और असुरक्षित रास्तों पर न जाने कब जानवर, ठग, डकैत, चोर उचक्के मिल जायें. इसी लिये लोग बहुत बडे झुंडमें अथवा किसी मुहीम पर निकले हुये सैन्य के साथ ही जाया करते थे, लेकिन सब को यह अवसर कैसे प्राप्त हो?! इन्हीं कारणवश घर का कोई वृद्ध तीर्थयात्रा पे जाने की बात भी करता तो उसके घरवाले उदास हो जाते थे क्योंकि जानोमाल का खतरा तो था ही, परंतु यात्रा में बहुत समय - यहां तक की कुछ वर्ष - लगने के कारण यात्रा का जो अंतिम पडाव वाराणसी अर्थात काशी हुआ करता था वहां तक पहुंचते पहुंचते मनुष्य का अंतिम समय आ ही जाता था.

ऐसे समय में श्रीमंत राधाबाई माताजीने अपने पेशवा पुत्र के सामने उन्हें तीर्थयात्रा पर भेजने का प्रस्ताव रखा. चूंकि बाजीराव को डर नामकी चीज पता नहीं थी, उन्होंने तुरंत हामी भर दी. सन १७३५ के फरवरी महीने में श्रीमंत राधाबाई माताजी इस तीर्थयात्रा पर निकल पडीं. उनक साथ उनकी कन्या और बाजीराव की छोटी बहन भिऊबाई, भिऊबाई के पती आबाजी नाईक जोशी, और आबाजी के भाई बाबूजी नाईक थे.

नर्मदा पार करने के पश्चात श्रीमंत राधाबाई माताजी और उनके सहयात्री माळवा से होते हुए १८ मै को उदयपूर पहुंचे. वहां के राणाजीने माताजी को पूरे सन्मान के साथ राजप्रासाद मे ले जाकर गहने, वस्त्र, एवं नगद पैसे और अनेक भेटवस्तुएं देकर अतिउत्तम आदरसत्कार किया. उदयपूर में माताजी ने वर्षा ऋतू के पूरे चार माह बिताए. उदयपूर के पश्चात जयपूर के सवाई जयसिंगने भी माताजी का बहुत बढिया आदरसन्मान करते हुए एक हाथी और ढेरों रुपए दिये. अब इस बात पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा की राधाबाई केवल पेशवा खानदान की एक बेचारी विधवा नहीं थीं अपितु राजनिती एवं कूटनीती की उच्च कोटि की जानकारी रखनेवाली चतुर महिला थीं. शनिवारवाडा में उनके राय को विशेष महत्त्व हुआ करता था. उदयपूर और जयपूर में उन्होंने स्वयं एवं अपने साथ आये पेशवा के राजनितीज्ञों द्वारा पर्याप्त राजनिती की बातचीत अवश्य की होगी. इस  पश्चात उदयपूर से निकलते समय जयसिंगने अपने वकीलों मे माध्यम से मुघल प्रदेश मे यात्रा आसान होने हेतू राधाबाई माताजी के लिये पारपत्रों का प्रबंध किया तथा उनके सुरक्षा के लिए कुल मिलाकर चार हजार सैनिकों को भेजा.

इसके बाद तीर्थयात्रा में राधाबाई माताजी का पहला पडाव था मथुरा. अब यहां जो हुआ वह पढकर आपको बहुत अचरज होगा परंतु वह बताने से पहले मैं आपसे अनुरोध करुंगा की आप इस लेख का पहला वाक्य फिरसे पढें - डर, खौफ, भय...क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता इसकी सूची बडी लंबी है.

मथुरा में उन्हे मिला वह मुघल सरदार जिसे श्रीमंत बाजीराव ने रण मे एक से अधिक बार पराजित किया था - महंमद खान बंगश. बंगश बाजीराव का शत्रू था. अगर रण मे वह सामने मिलते तो बाजीराव का सर काटने को वह उत्सुक होता. यहां तक कि किसी और समय में बाजीराव पेशवा के माताजी को वह आगे भी जाने न देकर वापस लौटा सकता था, या अपहरण कर बाजीराव से कुछ राजनयिक लाभ उठा सकता था. लेकिन बाजीराव के पराक्रम का डर पूरे हिंदूस्थान मे ऐसा फैला हुआ था कि श्रीमंत राधाबाई माताजी के मथुरा पहुंचते ही महंमद खान बंगशने उनका केवल आदरपूर्वक स्वागत ही नहीं किया अपितु माताजीका आग्रा की तरफ की यात्रा सुरक्षित हो इसका पक्का प्रबंध भी किया. इतना ही नहीं, पेशवा बाजीरव के दूत सदाशिव बल्लाळ ने पेशवा को लिखे खत मे कहा है की महंमद खान बंगश ने कहा की "मैं पेशवा की मां को मेरी मां से बिलकुल अलग नहीं समझता."


बंगशने माताजी एवं उनके सहयात्रीयों को पैसे की किसी प्रकार की कमी ना हो इसलिये उन्हें कुछ रुपये और भेंट वस्तुयें भी दी. महाराष्ट्र में खासकर ब्राह्मणों की विधवा औरतें एक विशिष्ट प्रकार की लाल साडी पहनती थीं जिसे "लाल आलवण" कहा जाता था. सर मुंडा हुआ होने के कारण उसी साडी के पहलू से हमेशा ढका हुआ रहता था. महंमद खान बंगश ने जो वस्तुएं माताजी को भेंट की उनमें ऐसी ही एक लाल साडी भी थी. अब उस समय में न तो इंटरनेट था और न टीव्ही. लेकिन किसी न किसी तरह बंगश को यह जानकारी थी की एक विधवा महिला को किस तरह की साडी देनी चाहिये और उसने वैसीही साडी को भेंट दी भी. कहा था न - डर, खौफ, भय...क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता इसकी सूची बडी लंबी है!

इस पश्चात माताजी एवं उनके सहयात्री काशी पहुंचे, उन्होने वहा बडा दानधर्म किया और अनेक घाट बनवाए तथा कई घाटों की मरम्मत करवायी. फिर दख्खन लौटने के पहले गया होकर वे १७३६ के  मई महिनें में पुणे लौटीं. लौटनें पर उनका पुणे के लोगों ने और शनिवारवाडा पर बडा आदरसत्कार किया गया.

यह केवल एक तीर्थयात्रा थी? बिलकुल नहीं. यह एक तीर्थयात्रा होने के साथ साथ श्रीमंत पेशवा बाजीराव के लिये एक राजनयिक विजय भी था. इस यात्रा में माताजी ने और उनके साथ गये दूतों ने न केवल राजनयिक बातचीत की उसका परिणाम ये हुआ कि दिल्ली के बादशहा महंमद शाह के दरबार में बाजीराव के पक्ष में सोचनेवाले सरदारों का एक गुट तैय्यार हुआ. आजकल लॉबींग का जो प्रभाव दिखता है यह कुछ उसी प्रकार की चीज थी.

डर, खौफ, भय...क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता और अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसका उदाहरण तो हमने देख लिया. अब अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी आज के समय का एक उदाहरण देखकर हम चर्चा करते हैं.

संजय लीला भन्साली के पास उसीके कथन के अनुसार बारह साल थे बाजीराव-मस्तानी फिल्म के विषय मे अनुसंधान करने हेतू. इंटरनेट के होते हुए, आधुनिक पुस्तकालय के होते हुए बारह साल के अनुसंधान के बाद उसने अपनी फिल्म में क्या दिखाया? श्रीमंत महापराक्रमी बाजीराव पेशवा की आदरणीय माताजी को सफेद साडी पहने हुए और मुंडन किये हुए सर को खुला छोड घूमनेवाली एक पागलपन का दौरा पडे महिला के रूप में पेश किया. फिल्म में पागलों की तरह कई दृश्यों मे हसते हुए दिखाया. अब माताजी को जो नहीं छोडता वह पेशवा के बाकी रिश्तेदारों को कैसे छोडता. बाजीराव की प्रथम पत्नी श्रीमंत काशीबाई साहेब के पैरों मे हमेशा दर्द रहा करता था जिस कारण वह ठीक से चल भी नहीं सकतीं थी. उन्हें मस्तानी के साथ अंग प्रत्यंग का घिनौना प्रदर्शन करते हुए नाचते हुए दिखाया गया. बाजीराव खुद मानसिक रूप से असंतुलित और उनके पुत्र नानासाहब दुष्ट और दुर्व्यवहारी दिखाया गया. और भी बहुत सी चीजें है लेकिन आप को और ज्यादा बोर नहीं करना चाहता.

जो जानकारी आजसे लगभग ढाईसो साल पहले महंमद खान बंगश को थी वह आज अनुसंधान के सारे आधुनिक संसाधन उपस्थित होते हुए भी भन्साली को नहीं होगी? सारे विश्व की खबर रखने वाले बॉलिवुडीया भन्साली को क्या यहां की औरते कैसे कपडे पहनती थीं इसकी जानकारी नहीं थी? क्या उसे बाजीराव के पुत्र नानासाहेब तथा प्रथम पत्नी काशीबाई के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी?

थी. अवश्य जानकारी थी. नहीं था तो केवल डर, खौफ, भय. गोलीयों की रासलीला रामलीला (रामलीला), बाजीराव-मस्तानी, और अब पद्मिनी जो महारानी पद्मिनी बन रही है, वो भी पद्नावती ऐसे नाम बदलकर, इन फिल्मों के जरीये भन्साली ने पूरे हिंदू समाज को खुलकर चुनौती दी है कि "देखो भै, मैं तो नही डरता आप असे. और जब डर न हो, तो आदमी क्या क्या करता है ये तो आपने देख ही लिया है. अरे  भै आप जैसे ही तो मेरी फिल्में हिट कराते हैं!"

दाऊद इब्राहीम और बाकी के अंडरवर्ल्ड का खौफ उनको व्हिलैन की तरह दिखाने की इजाजत नहीं देता, और हिंदूओं का डर रहा नहीं इसी लिये हिंदू महापुरुष और महिलाओं पर विकृत फिल्में बनाने की उद्दंडता बढती जाती है.

डर, खौफ, भय...क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता इसकी सूची बडी लंबी है. और अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी. अब दूसरे प्रकार का उदाहरण भी आपने देख लिया.

सोचिये, अगर हमारे राष्ट्रपुरुषों एवं महिलाओं का अपमान रोकना है, तो डर कैसे पैदा करना है. या फिर क्रियेटिव्हीटी देखने फिल्म देखनी है, तो देखिये. कुछ ही सालों बाद डर आपके दरवाजे तक होगा. सोचिये. बाकी जो है, सो हैई है.

इस विषय पर एक अलग लेख:  https://mandarvichar.blogspot.com/2017/02/blog-post_3.html

© मंदार दिलीप जोशी
माघ  शु. १३, शके १९३८

Monday, February 6, 2017

प्रेश्यावृत्ती

मैं सबसे पहले तो जनरल वि. के. सिंगजी को धन्यवाद देना चाहूंगा की उन्होंने प्रेश्या (presstitute) इस संज्ञा को जन्म देकर भांड पत्रकारों को अपनी ()योग्यता का स्मरण कराया.

दुसरे
तो मैं उन सारी वेश्यायों की माफी मांगना चाहूंगा क्योंकि वह केवल अपना शरीर बेचती हैं, अपनी आत्मा और अपने देश का सौदा नहीं करतीं.

यह मै क्यों कह रहा हूं?


http://marathi.webdunia.com/article/national-marathi-news/soul-117020600005_1.html

यह खबर पढीये. इस मराठी खबर में लिखा है की एक महाराज के सामने नग्न अवस्था में सोने से एक जिंन आता है और उसके साथ शरीरसंबंध प्रस्थापित करने पर पैसों की बारीश होगी ऐसा ढोंग रचाकर एक महिला को फांसने का प्रयास करने वाले तीन लोगों के विरुद्ध पुलीस ने केस दर्ज कराया है.

जिन तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनके नाम हैं: 
रेमंड सॅम्युअल फ्रँकलिन (नांदेड सिटी) 
शेख झहीर अब्बास (चिंचवड)
रेश्मा रामदास पाडळे (चराडे वस्ती, वडगाव धायरी)

अब तीसरे नाम को देखकर पता चलता है की यह महिला है. तो महाराज इस संबोधन मे फिट होने वाले कौन है तो वह पहला या दूसरा नाम ही हो सकता है.

परंतु यह रेमंड ख्रिश्चन व्यक्ती है और शेख अब्बास मुसलमान व्यक्ती है, तो उन्हें महाराज कैसे कहा जा सकता है? चूंकि महाराज ये संबोधन केवल हिंदू साधूपुरुष को संबोधित करने हेतू उपयोग मे लाया जाता है, तो अगर गुनाहगार व्यक्ती अगर ख्रिश्चन या मुसलमान हो तो उन्हें खबर के शीर्षक तथा वर्णन मे 'महाराज' कैसे कहा जा सकता है? क्या उन्हें मुल्लापीर, फकीरया पाद्री, फादर क्यों नहीं कहा जाता? क्यों किया इस अखबार नें ऐसे?
 
क्योंकी इन खबरंडीयों को न्युजपेपर पढनेवालों की आदते पता है. बहुत से लोग कुछ बहुत ही रोचक खबर हो तो ही उसे पूरा पढते हैं. अन्यथा केवल शीर्षक को पढकर ही आगे निकलते हैं. लेकिन हमारा मस्तिष्क एक काँप्युटर से मिलता जुलता है. जैसे आप इंटरनेट सर्फ करते करते अनेकों साईट देखते हैं और आगे चले जलते हैं, फिरभी आपके काँप्युटर पर कुकीज और टेम्पररी इंटरनेट फाईल्स का जमावडा होने लगता है. आपके घर के काँप्युटर पर जमा हुए इन चीजों को आप नियमित तौर पर डिलीट करके साफ कर सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश आपके मस्तिष्क में जमा उन अनगिनत खबरों के शीर्षकों को आप डिलीट या साफ नहीं कर सकते.

अगर आप सतर्क हों, तो आपको ऐसा ही लगता रहेगा की किसी हिंदू महाराज के अत्याचार की खबर है. लेकिन सत्य तो कुछ और ही होता है. यह कोई पहली बार नहीं है जो ऐसे हुआ है. धर्म की दुहाई देकर चमत्कार करनेवाला बलात्कारी पुरुष अगर ख्रिश्चन या मुसलमान है तो खबर के साथ छपा स्केच किसी भगवा वस्त्रधारी महाराज का ही होता है और खबर के शीर्षक में भी उसका संबोधन "साधू", "महाराज", या फिर ऐसा ही कुछ होता है जिससे उडते उडते खबर पढने वाले को ये लगे की किसी हिंदू धर्म धर्मपुरुष की गंदी करतूत है.

अब ये दूसरी खबर पढीये कुछ महीनों पहले नजर आयी थी.
http://www.deccanchronicle.com/nation/crime/240616/meerut-dalit-girl-bobbitises-man-during-rape-attempt.html




इसका शीर्षक था: Dalit girl bobbitises man during rape attempt. यानी की एक दलित लडकीं ने उसपर बलात्कार का प्रयास करने वाले एक आदमी का लिंग काट दिया. इस खबरंडी का तो लिंग काटकर सूअर के मांस के साथ उसेही खिला देना चाहीये. क्योंकि इस शीर्षक और खबर में दोगुना हरामीपन किया गया है. इस खबर को उडते उडते पढकर आगे निकलने वालेलोगों के मस्तिष्क में दो बाते हमेशा के लिये रजिस्टर हो जायेंगी () जिस लडकी पर बलात्कार का प्रयत्न हुआ है वह दलित है () बलात्कार का प्रयास करने वाला आदमी जरूर उच्च जाती का पुरुष है.

इस खबरंडी ने इस बात का भी ध्यान रखा है की अगर आप शीर्षक के आगे निकल भी गये और पहला वाक्य पढ भी लिया तो भी आपके दिमाग मे उपरोक्त दो निष्कर्ष पक्के ही हो जायेंगे. पहला वाक्य है: Security has been stepped up in the village as a precautionary measure, since the accused and the girl belonged to different communities. इस संज्ञा "different communities" का यह प्रयोजन है की आप सोचें की वह दलित लडकी और उसपर बलात्कार का प्रयास करनेवाला दोनों एक ही धर्म के लेकिन अलग जातीयों के है, की एक हिंदू और दुसरा मुसलमान. तो "different communities" की जगह पर सही शब्द होने चाहीये थे "different religions".

पहली बात तो यह गंदा अपराध जाती आधारित नहीं है तो फिर लडकी के दलित होने के उल्लेख का कारण ही नहीं बनता है. दुसरी बात तो यह की इस खबर में बलात्कार का प्रयास करनेवाला एक मुसलमान है.  (The girl snatched the knife from the accused Raees when he attempted to force himself on her, and attacked his private parts with it.)

तो फिर खबरंडी महाशय, खबर का शीर्षक होना चाहीये Hindu dalit girl bobbitises Muslim man during rape attempt. क्यों, कुछ गलत कहा?

महोदय और महोदया, कुछ समझ में आया? फ्री प्रेस और फ्रीडम ऑफ स्पीच इसी को कहते है!!!

आप सब से निवेदन हैकी ऐसी खबरें अगर पढेंतो पूरी पढें और ऐसा हरामीपन अगर नजर आयेतो तुरंत उस अखबारको ईमेल भेजकर उसकी जरूर 'खबर लें'.

© मंदार दिलीप जोशी